दोषी ‘एडीएम’ और ‘एक्सईएन’ को क्लीन ‘चिट’, निर्दोष ‘जेई’ को ‘सजा’
जांच में यह भी खुलासा हुआ कि तत्कालीन सचिव और एक्सईएन द्वारा जेई को अपने रास्ते से हटाने के लिए साजिश रची गई थी और उपाध्यक्ष को गुमराह करके जेई के खिलाफ पत्र लिखवाए गए थे. मुख्य लिपिक एमके सोलंकी, तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय, तत्कालीन सचिव कमलेशचंद्र और तत्कालीन सहायक अभियंता/प्रभारी एक्सईएन संदीप कुमार के द्वारा साक्ष्यों और दस्तावेजों को जांच अधिकारी को उपलब्ध नहीं कराया गया.
दोषी ‘एडीएम’ और ‘एक्सईएन’ को क्लीन ‘चिट’, निर्दोष ‘जेई’ को ‘सजा’
मुख्य बातें
- क्लीन चिट और सजा का विरोधाभास: आवास एवं शहरी नियोजन के प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद के एक आदेश पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिसमें अपर आयुक्त की जांच को दरकिनार कर तत्कालीन बीडीए सचिव/एडीएम कमलेशचंद्र और तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय को क्लीन चिट दे दी गई है, जबकि जांच रिपोर्ट में निर्दोष बताए गए तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को ‘परिंदा का दंड’ सुनाते हुए उनके चरित्र पुस्तिका में दर्ज करने का निर्देश बुलंदशहर-खुर्जा के विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को दिया गया है.
- ईमानदार अधिकारी का उत्पीड़न: जेई अनिल कुमार त्यागी, जो भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन चुके थे, उन्हें बस्ती से हटाने के लिए न सिर्फ डराया-धमकाया गया, बल्कि कार्यालय के लोगों द्वारा उनके साथ मारपीट की गई और उनका मोबाइल छीन लिया गया. अवैध निर्माण कर रहे भवन स्वामियों से उन्हें पिटवाया भी गया.
- शहरी व्यवस्था और जीरो टॉलरेंस पर सवाल: इस आदेश से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और ईमानदार का मनोबल गिरेगा. योगी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति के बीच इस तरह का मामला पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
बस्ती: उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस के दावों के बीच एक हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। आवास एवं शहरी नियोजन विभाग के प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद के एक हालिया आदेश ने प्रशासनिक महकमे में हलचल मचा दी है और पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में अपर आयुक्त की जांच को दरकिनार करते हुए तत्कालीन बीडीए सचिव/एडीएम कमलेशचंद्र और तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय को तो क्लीन चिट दे दी गई है, लेकिन जांच रिपोर्ट में पूरी तरह निर्दोष साबित हुए तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को अनोखी सजा सुना दी गई है।
ईमानदार जेई को प्रताड़ित करने का आरोप
अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, जेई अनिल कुमार त्यागी भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन चुके थे। उन्हें बस्ती से हटाने के लिए न केवल डराया-धमकाया गया, बल्कि कार्यालय में उनके साथ मारपीट कर मोबाइल तक छीन लिया गया। आरोप है कि अवैध निर्माण कर रहे भवन स्वामियों से उन्हें सरेआम पिटवाया भी गया।
जांच रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि तत्कालीन सचिव और एक्सईएन ने अपने रास्ते से हटाने के लिए जेई के खिलाफ गहरी साजिश रची थी। उपाध्यक्ष को गुमराह करके जेई के खिलाफ पत्र लिखवाए गए और जानबूझकर उन्हें दोषी साबित करने की कोशिश की गई। मुख्य लिपिक एमके सोलंकी, तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय, तत्कालीन सचिव कमलेशचंद्र और तत्कालीन सहायक अभियंता संदीप कुमार पर बार-बार निर्देश के बावजूद जांच अधिकारी को साक्ष्य व दस्तावेज उपलब्ध न कराने के गंभीर आरोप हैं।
बस्ती के मानीराम क्षेत्र में गांधी नगर योजना के तहत दुकानों और भूखंडों के आवंटन में अनियमितता का आरोप लगा था।
आरोप था कि 1233 के सापेक्ष 1192 लाभार्थियों को ही टी-पॉइंट / कब्जा दिया गया, लेकिन शासन को भेजी गई रिपोर्ट में सभी 1233 प्लॉट धारकों का सत्यापन दिखा दिया गया। इसी मामले की जांच के लिए शासन स्तर से जांच बैठी।
जांच में तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी का नाम आया। शुरुआती जांच रिपोर्ट में त्यागी को निर्दोष बताया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था कि उन्होंने भ्रष्टाचारियों से समझौता नहीं किया, इसलिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
लेकिन अंतिम आदेश में कहानी पूरी तरह पलट गई।
जांच रिपोर्ट में किसे बचाया, किसे फंसाया?
सूत्रों के अनुसार प्रमुख सचिव के अंतिम आदेश में-
1. क्लीन चिट पाने वाले अधिकारी:
• तत्कालीन उपाध्यक्ष / एडीएम, बस्ती विकास प्राधिकरण • तत्कालीन एक्सईएन कनक पांडेय • मुख्य लिपिक पंकज श्रीवास्तव • तत्कालीन सचिव कन्हैयालाल • सहायक लेखाधिकारी महेंद्र कुमार • एसोसिएट प्लानर पंकज
इन सभी के खिलाफ कोई कार्रवाई की संस्तुति नहीं की गई।
2. सजा पाने वाले:
• जेई अनिल कुमार त्यागी – इनके खिलाफ विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई और FIR दर्ज करने तक के निर्देश दे दिए गए।
आदेश में JE पर ‘पॉलिसी का दंश’ जैसे शब्दों का प्रयोग करते हुए उन्हें दोषी ठहराया गया है।
JE को क्यों माना जा रहा है ईमानदार?
खबर के अनुसार, JE अनिल कुमार त्यागी बस्ती में भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन गए थे। उन्हें बस्ती से हटाने के लिए लगातार उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना दी गई। कार्यालय के ही कुछ लोगों द्वारा उनके खिलाफ साजिश रची गई।
आरोप है कि बिना परीक्षण कराए ही उपाध्यक्ष ने JE के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति दे दी। प्रमुख सचिव स्तर पर भी उन तथ्यों का परीक्षण नहीं किया गया, जिसमें कहा गया था कि नक्शा पास करने में तत्कालीन एसोसिएट और अन्य अधिकारियों की भूमिका थी, लेकिन सारा ठीकरा JE पर फोड़ दिया गया।
यहाँ तक कि एक अन्य ईमानदार JE गणेश गिरि का भी इसी तरह उत्पीड़न का मामला सामने आया था।
3 बड़े सवाल जो जांच पर उठ रहे हैं:
1. जब 1233 में से 1192 को ही कब्जा मिला, तो 1233 का सत्यापन कैसे दिखा? यह मामला हाईकोर्ट में भी विचाराधीन बताया जा रहा है, लेकिन जांच रिपोर्ट में इस बिंदु पर कोई चर्चा नहीं की गई।
2. मीडिया ने जब BDA उपाध्यक्ष से सवाल पूछने के लिए पत्र लिखा, तो उसका खुलासा कैसे हुआ? आरोप है कि JE के खिलाफ मीडिया को भड़काने के लिए खुद प्राधिकरण से पत्र लिखवाया गया था।
3. जब मुख्य दोषी बताए जा रहे सचिव और XEN ने खुद को बचाने के लिए JE को रास्ते से हटाने की कोशिश की, तो उनकी भूमिका की जांच क्यों नहीं हुई?
फिलहाल इस आदेश के बाद बस्ती विकास प्राधिकरण के कर्मचारियों और आम लोगों में भारी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि अगर ईमानदार JE को सजा और दोषी बड़े अधिकारियों को क्लीन चिट मिलेगी, तो पूरी व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाएगा।
‘परिंदा का दंड’ और चरित्र पुस्तिका में प्रविष्टि
एक तरफ जहां शासन स्तर से दोषी माने जा रहे अधिकारियों को राहत दे दी गई, वहीं दूसरी ओर जांच में निर्दोष पाए गए जेई अनिल कुमार त्यागी को ‘परिंदा का दंड’ देते हुए उनके आचरण को उनकी चरित्र पुस्तिका में दर्ज करने का निर्देश बुलंदशहर-खुर्जा विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को दिया गया है। साथ ही, जेई के खिलाफ चल रही अनुशासनात्मक कार्रवाई को भी समाप्त कर दिया गया है।
व्यवस्था पर उठ रहे गंभीर सवाल
इस फैसले के बाद जानकारों का मानना है कि यदि इस तरह ईमानदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होगी और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण मिलेगा, तो प्रशासनिक व्यवस्था और सरकारी नीतियों का इकबाल कमजोर होगा। इस पूरे प्रकरण ने बस्ती विकास प्राधिकरण के कामकाज और प्रशासनिक पारदर्शिता पर बड़े और गहरे सवालिया निशान लगा दिए हैं।
नोट: यह खबर दैनिक समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट और बस्ती विकास प्राधिकरण से जुड़े दस्तावेजों पर आधारित है। न्यूज पोर्टल किसी भी पक्ष का पक्षधर नहीं है। संबंधित अधिकारियों का पक्ष आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।













